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जम्मू-कश्मीर में गैर-कश्मीरी नागरिकों पर आतंकियों का बढता अत्याचार!

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Kashmir | News Aur Chai
जम्मू-कश्मीर में बीते कुछ दिनों से गैर-कश्मीरी नागरीकों पर आतंकी हमलों के मामले सामने आ रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर में बीते कुछ दिनों से गैर-कश्मीरी नागरीकों पर आतंकी हमलों के मामले सामने आ रहे हैं। खासतौर से गैर-कश्मीरी मजदूरों को निशाना बनाया जा रहा है। जम्मू-कश्मीर में आतंकियों द्वारा अब तक नौ नागरीकों की हत्या कर दी गई है। 5 अक्टूबर को श्रीनगर में आतंकियो ने वीरेंद्र पासवान की गोली मारकर हत्या कर दी थी। वीरेंद्र पासवान बिहार का रहनेवाला था और पिछले दो वर्षों से श्रीनगर में गोलगप्पे बेचता था। आतंकियों ने 6 अक्टूबर को फार्मेसी मालिक एम.एल बिंदू, स्ट्रीट वेंडर और एक टैक्सी ड्राइवर की हत्या कर दी थी। श्रीनगर के ईदगाह इलाके में आतंकियों ने स्कूल की मुख्य अध्यापिका सुपिंदर कौर और अध्यापक दीपक शर्मा की गोली मारकर हत्या कर दी।

16 अक्टूबर को अरविंद कुमार साह पर आतंकियों द्वारा गोली चलाई गई, उन्हें गंभीर स्थिति में श्रीनगर के SMHS अस्पताल ले जाया गया जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अरविंद कुमार बिहार के बांका जिले में रहनेवाले थे और श्रीनगर में गोलगप्पे बेचते थे। 16 अक्टूबर की ही शाम को आतंकियों ने पुलवामा में सगीर अहमद नाम के व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी। सगीर अहमद उत्तरप्रदेश का रहनेवाला था एवं पेशे से वह एक कार्पेंटर था। 17 अक्टूबर, रविवार को आतंकियों ने दक्षिण कश्मीर के कुलगाम में के तीन मजदूरों को गोली मार दी, जिससे दो मजदूरों की मृत्यु हो गई और एक मजदूर बुरी तरह से घायल हो गया।

कश्मीर के अलग अलग हिस्सों में अनेकों प्रवासी बसे हुए हैं। अधिकतर लोग रोजगार की तलाश में बिहार से कश्मीर आए हुए हैं। लोगों का कहना है कि वे अगले महीने तक अपने घर बिहार जाना चाहते थे मगर दहशतगर्दों के कारण उन्हें काम छोड़कर बीच में ही जाना पढ़ रहा है। लोग डरे हुए हैं कि यदि स्थिति जल्द से जल्द सामान्य नहीं हुई तो उनका रोजगार और बच्चों की पढ़ाई छुट जाएगी।

27 वर्षों से कश्मीर में रह रहे 45 वर्षीय पंकज पासवान का कहना है कि उन्होंने इतने वर्षों में कश्मीर की इससे भी बदतर हालत देखी है। उनका कहना है कि एक के बाद एक हो रही हत्याओं से कश्मीर में दहशत का माहौल बना हुआ है और वे भी इस समय बिहार लौट जाना चाहते हैं। आतंकियों द्वारा निशाना बनाए गए नागरिकों का कहना है कि अनुच्छेद-370 के हटने से और कश्मीर के विकास से आतंकी बौखलाए हुए हैं। इसी वजह से वो लोगों पर हमला कर रहे हैं। नागरिकों का कहना है कि रविवार को हुए आतंकी हमले से पहले उन्हें उम्मीद थी कि हालात सुधर जाएंगे मगर लगातार हो रही हत्याओं से उन्हें भी जान का खतरा बना हुआ है।

पीडीपी अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती का कहना है कि, यह घटना निंदनीय है। भोले भाले लोगों को बेवजह मरना और उनका रोज़गार छीनना बेहद दुःख की बात है।

बीजेपी के प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने कहा कि यह शत प्रतिशत नरसंहार है, गैर-कश्मीरियों की यह भीषण हत्या बिल्कुल अमानवीय है और यह आतंकियों की बौखलाहट को दर्शाता है।

सीपीआई के नेता मोहम्मद युसूफ तारिगामी का कहना है कि भोले भाले मजदूरों की हत्या एक जघन्य अपराध है, सिर्फ निंदा करना काफी नहीं है, ऐसे समय में सभी को एकजुट होकर इस तरह के अपराध के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए और आतंकियों को कड़ी सजा देनी चाहिए।

जम्मू कश्मीर की लेफ्टनेंट गवर्न मनोज सिन्हा ने कहा है की निर्दोषों के खून का बदला इन आतंकियों से लिया जायेगा, कश्मीर की शांति को भंग करने कि कोशिश की जा रही है, लोगों को आगे बढ़ने से रोका जा रहा है, कश्मीर के विकास को रोकने की साजिश हो रही है मगर हम ऐसा नहीं होने देंगे। मनोज सिन्हा ने अपने रेडियो कार्यक्रम ‘आवाम की आवाज’ में कहा “आतंकी हमले में मारे गए के लिए मैं शोक व्यक्त करता हूं, हम सभी लोग आपके साथ हैं और आतंकियों से हार एक हत्या का पूरा बदला लिया जायेगा यह मेरा वादा है”।

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Kalam Se

कुनन – पोशपोरा बलात्कार केस: सेना पर लगे कलंक और कश्मीरी पीड़ा की कहानी

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कुनन - पोशपोरा बलात्कार केस

हिन्दुस्तान में रोज हजारों केस दर्ज होते हैं और वो सैकड़ों सालों तक लटके रहते हैं। यहाँ तक कि उनका निर्णय आने तक बहुत कम लोग ऐसे बचे होते हैं जिन्हें उस केस की कोई याद हो और ये सब हमारे जीवन का एक अंग हो गया है इसीलिए इसमें विस्मय भी नहीं होता पर तब भी कुछ मुकदमे ऐसे होते हैं जिन पर जल्दी निर्णय आवश्यक होता है और आवश्यक होता है – उनसे जुड़े भ्रमों का निवारण क्योंकि केस की यादें चाहे दिमाग से दूर हो जाएँ पर ये भ्रम इतनी जल्दी भुलाया नहीं जाता और ऐसा ही एक केस जो भ्रमों के मायाजाल को खुद में समेटे हुए है, वो है – कुनन-पोशपोरा बलात्कार केस।

वो 23 फरवरी 1991 की शाम थी और जगह थी, कश्मीर घाटी के कुपवाड़ा जिले में पड़ने वाले दो गाँव – कुनन और पोशपोरा। यह वह दौर था जब कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था, अभी हाल ही में शांति के हिमायती कश्मीरियों के धार्मिक नेता मीर वाइज की हत्या की गई थी और सूबे में राष्ट्रपति शासन लागू था। साथ-ही-साथ कश्मीर का सैन्यकरण शुरू हो चुका था और तलाशी अभियान एक आम बात थी।

अब 23 फरवरी की तारीख में वापस लौटते हैं। उस दिन शाम को चौथी राजपूताना राइफल्स और अङसठवीं माउंटेन ब्रिगेड के सैनिक पड़ोसी गाँवों कुनन और पोशपोरा में दाखिल हुए। गाँवों से उन्हें कुछ संदिग्ध गतिविधियाँ संचालित होने का शक था, इसीलिए ‘सर्च एंड कार्डन ऑपरेशन’ शुरू किया गया। इस ऑपरेशन में सुरक्षा बलों की एक टुकड़ी गांव को घेर लेती है और घोषणा करती है कि गांव के सभी पुरुष एक मैदान में इकट्ठा हो जाएं। इस मैदान में इन पुरुषों को सेना की गाड़ी के सामने से गुज़रना होता है जिसमें चेहरा छुपाए एक कैट या मुखबिर मौजूद होता है। यह मुखबिर हर आदमी को गौर से देखता है और शिनाख्त करता है कि वह उग्रवादियों से मिला हुआ है या नहीं। इस दौरान अगर उसे किसी पर शक होता है तो वह गाड़ी का हॉर्न बजा देता है। साथ-ही-साथ इसी दौरान घरों की तलाशी भी समानांतर जारी रहती है।

ठीक इसी तरह का घटनाक्रम उस दिन कुनन-पोशपोरा में भी हुआ। सेना ने पुरुषों और महिलाओं को अलग-अलग कतारों में खड़ा किया पर इसके बाद जो हुआ उस पर आज तक संशय है।

18 मार्च को खबर आई कि भारतीय सेना ने हथियारों की तलाशी के नाम पर 30 महिलाओं का बलात्कार किया है, हालाँकि ये संख्या निश्चित ना रही और वक्त-बेवक्त इसमें उतार-चढ़ाव आते रहे।

कहते हैं कि उस रात गाँव में क्या हुआ ये छिपाने के लिए सेना ने कई दिनों तक गाँव की बाहरी घेरेबंदी नहीं खुलने दी और गाँव की बात गाँव में ही दफ्न हो गई पर वक्त बीता और उस रात की घटना का जिन्न बाहर आया। दरअसल घटना के लगभग चौथाई शताब्दी बाद एक किताब आई, जुबान सीरिज़ से प्रकाशित, नाम था – ‘डू यू रिमेंबर कुनन पोशपोरा’। किताब को लिखा था, पाँच कश्मीरी लड़कियों ने, जिनके नाम थे – एसार बतूल, इफरा बट, समरीना मुश्ताक, मुंजा राशिद और नताशा रातहर। ये पाँचों ‘जम्मू-कश्मीर कोएलिशन ऑफ सिविल सोसायटीज’ के लिए ‘जम्मू-कश्मीर में यौन हिंसा और रोग प्रतिरोधक शक्ति’ पर काम कर रही थी और इसी दौरान इन्हें कुनन-पोशपोरा हादसे की जानकारी मिली।

अब किताब पर आते हैं कि उसमें क्या लिखा है तो किताब में उस दिन की तथाकथित पीड़िताओं की आपबीती उनके काल्पनिक नामों के साथ दर्ज है और यदि पुस्तक का सार देखें तो उसमें बस ये बताने का प्रयास किया गया है कि उस दिन भारतीय सेना बलात्कार का विचार लेकर ही गाँवों में दाखिल हुई थी और ये सब बताने के लिए कई दृष्टांतों का प्रयोग किया गया है। जैसे – सेना अपने साथ शराब की बोतलें लेकर आई थी या एक पीड़िता का बयान कि जब मैं घर में दाखिल हुई तो मैंने सैनिकों के पैंट की जिप खुली देखी और मैं उनके मंसूबे समझ गई आदि।

लेकिन ये बस कहानी का एक हिस्सा है, एक दूसरा पक्ष भी है जो भारतीय सेना का है और भारतीय सेना ऐसी किसी घटना के अस्तित्व से ही इन्कार करती है। साथ-ही-साथ अपने पक्ष में जाँचों का भी हवाला देती है जो कि इस केस के सम्बंध में आज तक हुई हैं।

दरअसल 25 फरवरी को गाँव वालों ने स्थानीय तहसीलदार को चिट्ठी भेजी और कुपवाड़ा के डिप्टी कमिश्नर एस एस यासी ने 2 मार्च को इस चिट्ठी के मिलने की पुष्टि की। इसी चिट्ठी के आधार पर 8 मार्च को एफआईआर दर्ज की गई।

7 मार्च को डिप्टी कमिश्नर ने तत्काली डिविजनल कमिश्नर वजाहत हबीबुल्लाह को लिखा, ‘मुझे जिस घटना के बारे में जानकारी दी गई है उसे जानकार मैं सदमे में हूँ।’ बहरहाल यह घटना मार्च के महीने में सार्वजनिक दायरे में आई। 18 मार्च 1991 को वजाहत हबीबुल्लाह ने गाँव का दौरा किया और इसी दिन घटना की जानकारी मीडिया को भी दी गई।

सरकार को सौंपी गोपनीय रिपोर्ट में हबीबुल्लाह ने आरोपों की सत्यता को लेकर सवाल उठाए लेकिन उन्होंने गाँव वालों के गुस्से को भी स्वीकार किया।उन्होंने इस मामले में उच्चाधिकार समिति बिठाए जाने की माँग की।उन्होंने कहा कि जाँच रिपोर्ट में देरी से यह लग सकता है घटना को दबाया जा रहा है,साथ ही लंबी देरी की वजह से मेडिकल जाँच को लेकर कई तरह की शंकाएँ हैं।

हालाँकि जब हबीबुल्लाह की रिपोर्ट सार्वजनिक की गई तो कुछ जानकारियों को गायब कर दिया गया।घटना के करीब 22 सालों बाद हबीबुल्लाह ने यह कहा कि सरकार ने इस घटना को निपटने में गलत तरीका अख्तियार किया।

इन सभी घटनाओं के बाद बी जी वर्गीत की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित की गई जिसने कुनन-पोशपोरा गाँव के लोगों के आरोप को ‘बेकार’ करार दिया। समिति ने कहा कि इस घटना की आड़ में सेना को बदनाम करने की कोशिश की गई है, अंततः अक्टूबर 1991 में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने इस मामले को बंद कर दिया।

सालों तक वर्गीज समिति की रिपोर्ट को लेकर सवाल उठाए जाते रहे। मसलन कमेटी की तरफ से तीन पीड़ितों के मेडिकल जांच में उनके हाइमन के डैमेज होने की बात सामने आई थी जबकि वह शादीशुदा नहीं थीं। इसके अलावा कई पीड़ितों की छातियों और पेट पर जख्म के निशान थे। समिति ने कहा, ”पेट पर जख्म के निशान कश्मीरी महिलाओं में आम हैं क्योंकि वह कांगरी पहनती हैं,जहाँ तक हाइमन के डैमेज होने की बात है तो वह कई जाहिर कारणों की वजह से हो सकता है- मसलन चोट लगना या फिर शादी से पहले सेक्स।”

इसी बीच सामूहिक बलात्कार का आरोप झेल रही सेना ने ‘प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया’ से इस मामले की जाँच किए जाने की माँग की।

2011 में राज्य मानवाधिकार आयोग ने कहा कि आरोपी सैनिक घटना की रात शैतान बन गए। राज्य मानवाधिकार आयोग ने पीड़ितों को मुआवजा दिए जाने की माँग की और साथ ही आरोपियों के खिलाफ आपराधिक मामला चलाए जाने की सिफारिश की हालाँकि राज्य मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।

निर्भया बलात्कार कांड के बाद ये मामला फिर सुर्खियों में आया जब पीड़ितों ने 2013 की शुरुआत में हाई कोर्ट के समक्ष एक याचिका देकर राज्य मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों को लागू करने की अपील की हालाँकि कोर्ट ने पीआईएल को सही नहीं माना।

हाईकोर्ट से माँग खारिज होने के बाद पीडि़त सुप्रीम कोर्ट गए पर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने भी सुनवाई पर रोक लगा दी और बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा कानूनी रूप से ठण्डे बस्ते में चला गया।

लेकिन बस कानूनी रूप से, राजनीतिक रूप से नहीं और वैसे भी राजनीतिक रूप से तो इतने सालों में कभी-भी इसकी चिंगारी शांत नहीं हुई थी। जम्मू-कश्मीर के स्थानीय नेता इसे बुलंद करते रहते तो भारतीय शासन इसे नकारता रहता लेकिन अंततः एक मर्तबा सन् 2013 में तत्कालीन विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने घटना की सत्यता को स्वीकार करते हुए माफी माँगी।

माफी माँग ली गई पर न्याय नहीं मिला। आज कोई नहीं कह सकता कि घटना में किसका पक्ष सही है, इसीलिए निष्पक्ष जाँच की तो जरूरत है ना, ताकि पता चल सके कि क्या वास्तव में भारतीय सेना ने क्रूरता की थी या ये उसे बदनाम करने की साजिश मात्र थी क्योंकि जाँच होगी तो सच सामने आएगा, दोषी दंडित होंगे और बाकी कुछ हो या ना हो पर कश्मीरियों की रूह को सुकून जरूर मिलेगा, वो जानेंगे कि इस मुल्क में उनकी आवाज भी सुनी जाती है और ऐसा होगा तो अलगाववाद कम होगा। साथ ही सेना पर लगे कलंक की सच्चाई सामने आएगी और कश्मीर में सेना का भविष्य निर्धारित होगा।


Disclaimer: The opinions expressed within this article are the personal opinions of the author. The facts and opinions appearing in the article do not reflect the views of NAC and NAC does not assume any responsibility or liability for the same.

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Kalam Se

लाल को लील गया ताशकंद

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Lal Bahadur Shastri

मुल्क का एक प्रधानमंत्री जो विदेश जाता है तो एक ऐसे समझौते पर हस्ताक्षर करता है जिसके लिए वो खुद तैयार नहीं था, एक ऐसा प्रधानमंत्री जो युद्ध के उपरान्त ना केवल पड़ोसी शत्रु मुल्क की सारी बातें मानता है वरन् उसे खैरात भी देकर आता है, एक ऐसा नेता जिसके वापस आने पर एक दूसरे लापता नेता की सच्चाई सामने आने की संभावना बनती है पर वह नेता वापस नहीं आता और एक समझौते पर हस्ताक्षर के कुछ ही घंटों बाद मृत्यु को प्राप्त होता है। साथ-ही-साथ भारत से बाहर मृत्यु को प्राप्त होने वाला पहला और आज तक का एकमात्र प्रधानमंत्री बनता है। आज की कहानी उसी प्रधानमंत्री की कहानी है और उस प्रधानमंत्री का नाम है – लाल बहादुर शास्त्री तथा वह समझौता है – ताशकंद समझौता।

ये कहानी पाकिस्तान संचालित ऑपरेशन जिब्राल्टर के साथ शुरू होती है जिसके तहत पाकिस्तान कश्मीर के चार ऊँचाई वाले इलाकों गुलमर्ग, पीरपंजाल, उरी और बारामूला पर कब्जा करने की योजना बनाता है ताकि भारत से युद्ध लड़ने में आसानी हो पर हिन्दुस्तान को उसके मंसूबों का इल्म हो जाता है। हिंदुस्तानी फौज कार्यवाही करती है और ऑपरेशन जिब्राल्टर फेल हो जाता है। भारत की इस कार्यवाही से सरहद पार का क्रोध सारी सीमाओं को तोड़ देता है जिसकी परिणिति होता है – 1965 का युद्ध।

युद्ध के दौरान भारतीय सेना फिर हरकत में आती है। पाकिस्तानी सेना को खदेड़ा जाता है और भारतीय सेना की तैनाती लाहौर के बाहर तक हो जाती है लेकिन यहीं पर भारत के आर्मी चीफ जयंतो नाथ चौधरी एक गलती करते हैं जिसका वर्णन तत्कालीन रक्षा मंत्री यशवंत राव चव्हाण की पुस्तक ‘1965 वॉर, द इनसाइड स्टोरी: डिफेंस मिनिस्टर वाई बी चव्हाण्स डायरी ऑफ इंडिया-पाकिस्तान वॉर’ में दर्ज है। उसमें लिखा गया है कि भारत के आर्मी चीफ डरपोक किस्म के इन्सान थे।वे बहुत जल्द डर जाते थे। चव्हाण उनको कहते थे कि सीमा पर जाओ मगर चौधरी सीमा पर जाने से डरते थे। युद्ध के दौरान 20 सितंबर 1965 को प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने आर्मी चीफ से पूछा कि अगर जंग कुछ दिन और चले तो भारत को क्या फायदा होगा? सेना प्रमुख ने कहा कि आर्मी के पास गोला-बारूद खत्म हो रहा है इसीलिए अब और जंग लड़ पाना भारत के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री को सलाह दी कि भारत को रूस और अमेरिका की पहल पर संघर्ष विराम का प्रस्ताव मंजूर कर लेना चाहिए और शास्त्री जी ने ऐसा ही किया लेकिन बाद में मालूम चला कि भारतीय सेना के गोला-बारूद का केवल 14 से 20 प्रतिशत सामान ही खर्च हुआ था। अगर भारत चाहता तो पाकिस्तान का नामो-निशान मिटाने तक लड़ता रहता लेकिन भारत के सेनाध्यक्ष की गलत जानकारी देने की गलती के कारण ऐसा नहीं हो सका।

ख़ैर जो गलती होनी थी वो हो गई अब बारी बातचीत की थी और बातचीत की मेज माॅस्को में सजती है। वही माॅस्को जो उस समय भारत का करीबी समझा जाता था और शीत युद्ध के दौरान अमेरिका की पाकिस्तानपरस्ती के समय जो सदा भारत को सहायता मुहैया कराता था और यही कारण भी था कि वार्ता स्थल के रूप में अमेरिका पर रूस को तवज्जो दी गई।

वक्त बीतता है और 10 जनवरी की तारीख आ जाती है। इस दिन तक शास्त्री जी और पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान के बीच कई दौर की वार्ता हो चुकी थी और इस दिन समझौते पर हस्ताक्षर भी हो गए पर यह समझौता भारत के लिए कुठाराघात था क्योंकि भारत ने हाजी पीर और ठिठवाल पाकिस्तान को वापस दे दिए थे जबकि पाकिस्तान ने ‘नो वॉर क्लॉज़’ को मानने तक से इन्कार कर दिया था। कोई नहीं जानता कि शास्त्री ने ऐसी शर्तें क्यों मानी।शायद वो मुल्क वापस आते तो उनसे ये पूछा जाता पर नियति, उसे उसे तो कुछ और ही मंजूर था। एक सरकारी दस्तावेज के अनुसार, रात साढ़े बारह बजे तक सब कुछ सामान्य था पर तभी अचानक उनकी तबीयत खराब होने लगी जिसके बाद वहाँ मौजूद लोगों ने डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर आर एन चग ने पाया कि शास्त्री की साँसें तेज चल रही थी और वो अपने बेड पर छाती को पकड़कर बैठे थे। इसके बाद डॉक्टर ने इंट्रा मस्कूलर इंजेक्शन दिया। इंजेक्शन देने के तीन मिनट के बाद शास्त्री का शरीर शांत होने लगा, साँस की रफ्तार धीमी पड़ गई। इसके बाद सोवियत डॉक्टर को बुलाया गया। इससे पहले कि सोवियत डॉक्टर इलाज शुरू करते रात 1:32 पर शास्त्री की मौत हो गई।

हालाँकि ये मौत एक सामान्य मौत कभी नहीं मानी गई और उस रात हुए घटनाक्रम भी इसी ओर इशारा करते हैं। उस रात शास्त्री के होटल में प्रसिद्ध पत्रकार कुलदीप नैयर मौजूद थे। कुलदीप नैयर बताते हैं कि देर रात उन्होंने अपने घर पर फोन मिलाया। फोन उनकी सबसे बड़ी बेटी ने उठाया था। फोन उठते ही शास्त्री बोले, ”अम्मा को फोन दो।” शास्त्री अपनी पत्नी ललिता को अम्मा कहा करते थे।उनकी बड़ी बेटी ने जवाब दिया, ”अम्मा फोन पर नहीं आएँगी।” शास्त्री जी ने पूछा क्यों? जवाब आया क्योंकि आपने हाजी पीर और ठिथवाल पाकिस्तान को दे दिया है, वो बहुत नाराज हैं। शास्त्री को इस बात से बहुत धक्का लगा। इसके बाद वो परेशान होकर अपने कमरे में चक्कर लगाने लगे। हालाँकि कुछ ही देर में उन्होंने फिर से अपने सचिव वेंटररमन को फोन किया।वो भारत में नेताओं की प्रतिक्रिया जानना चाहते थे। उन्हें बताया गया कि अभी तक दो ही प्रतिक्रियाएं आई हैं, एक अटल बिहारी वाजपेयी की और दूसरी कृष्ण मेनन की,दोनों ने ही उनके इस कदम की आलोचना की है।

कुलदीप आगे बताते हैं कि उस समय भारत-पाकिस्तान समझौते की खुशी में होटल में पार्टी चल रही थी और चूँकि वे शराब नहीं पीते थे तो वे अपने कमरे में आ गए और सो गए।सपने में उन्होंने देखा कि शास्त्री जी का देहांत हो गया है। वे बताते हैं कि उनकी नींद दरवाजे की दस्तक से खुली।सामने एक रूसी औरत खड़ी थी, जो उनसे बोली, “यॉर प्राइम मिनिस्टर इज डाइंग।”

कुलदीप नैयर बताते हैं कि वे तेजी से अपना कोट पहनकर नीचे आये। वहाँ पर रूसी प्रधानमंत्री कोसिगिन खड़े थे। उन्होंने कुलदीप नैयर से कहा, ”शास्त्री जी नहीं रहे।” वहाँ पर बहुत बड़े से एक पलंग पर शास्त्री जी का छोटा सा शरीर सिमटा हुआ पड़ा था।कुलदीप नैयर बताते हैं कि वहाँ पर जनरल अयूब भी पहुंचे और कहा, “हियर लाइज अ पर्सन हू कुड हैव ब्रॉट इंडिया एंड पाकिस्तान टुगैदर” (यहां एक ऐसा आदमी लेटा हुआ है, जो भारत और पाकिस्तान को साथ ला सकता था।)

लेकिन अयूब खान का ये कथन पाकिस्तान के सिर्फ एक चरित्र को दिखाता है। कहानी का एक दूसरा पक्ष भी है जिसका वर्णन अरशद शामी खान की पुस्तक ‘थ्री प्रेसिडेंट्स एंड एन आइड: लाइफ, पावर एंड पॉलिटिक्स’ में किया गया है। उन्होंने लिखा है कि अजीज अहमद को शास्त्री की मौत की खबर मिली।वो खुशी से झूमता हुआ भुट्टो के कमरे में पहुँचा और कहा- वो मर गया। भुट्टो ने पूछा- ” दोनों में से कौन? हमारा वाला या उनका वाला?” इस कथन से ये सवाल उठता है कि क्या अयूब खान और लाल बहादुर शास्त्री में से किसी एक की हत्या निश्चित थी? क्या इस हत्या में भुट्टो का हाथ था?

ये शास्त्री के मौत पर एक मत और है कि है कि इसमें सीआईए का हाथ था। दरअसल वर्ष 1996 में रॉबर्ट ट्रमबुल नाम के एक पूर्व सीआईए अधिकारी ने कहा था कि शास्त्री की मौत के पीछे सीआईए का ही हाथ था और एक पूर्व अधिकारी का ऐसा कथन संशय तो उत्पन्न करता ही है।

यदि इन सबसे भिन्न सोवियत रूस का कहा माने तो शास्त्री जी को दिल का दौरा पड़ा था। ऐसा हो सकता है कि शास्त्री जी को इस बात की चिंता सता रही हो कि उन्होंने देश के लोगों से किया वादा पूरा नहीं किया। वो जानते थे कि इस समझौते से भारत में सब बहुत नाराज होंगे।भारतीय सेना सबसे ज्यादा मायूस होगी।शायद यही तनाव रहा हो और उन्हें दिल का दौर पड़ा हो पर रूस के इस सिद्धांत के बावजूद भी कुछ प्रश्न अनसुलझे ही रहते हैं-

1- शास्त्री जी का शव जब भारत लाया गया तो उनके परिवार ने मृत देह पर नीले निशान पाए परन्तु तब भी भारत एवं रूस में से किसी ने भी शव का पोस्टमार्टम कराने की जहमत नहीं उठाई।

2- उस दिन शास्त्री जी के निजी रसोइए राम नाथ ने खाना नहीं पकाया था जो कि सभी विदेशी दौरों में मात्र इसी कार्य के लिए उनके साथ रहता था। उसके स्थान पर उस समय रूस में भारत के राजदूत टी एन कौल के शेफ जान मुहम्मद ने खाना पकाया था। उम्मीद थी कि राम नाथ इस पर कोई स्पष्टीकरण देंगे पर इससे पहले ही उन्हें एक कार ने धक्का मार दिया और उनकी याददाश्त चली गई।

3- आम तौर पर बड़े नेता जिस कमरे में रुकते हैं उसमें एक घंटी लगी होती है ताकि जरूरत पड़ने पर किसी को बुलाया जा सके मगर शास्त्री जी के कमरे में कोई घंटी या बजर भी नहीं था।

4- शास्त्री जी जिस डायरी में अपने प्रतिदिन का घटनाक्रम लिखते थे, वो गायब थी जबकि उसके माध्यम से भारत के प्रतिकूल समझौते पर हस्ताक्षर के कारण पता चल सकते थे।

5- शास्त्री जी द्वारा प्रयुक्त थर्मस गायब था जिससे उसमें जहर होने की संभावना प्रतीत होती है।

6- सन् 2015 में इसी ताशकंद समझौते की एक तस्वीर सामने आई थी। जिसे देखकर ब्रिटिश फोरेंसिक एक्सपर्ट नील मिलर ने फोरेंसिक फेस मैपिंग रिपोर्ट के आधार पर दावा किया कि तस्वीर में उपस्थित लोगों में से एक शख्स नेताजी सुभाष चंद्र बोस हैं तो क्या शास्त्री जी ये सूचना लाने वाले थे कि नेताजी जिन्दा हैं? और क्या यही उनकी मौत का कारण बना?

बहरहाल ये सभी मात्र संभावनाएँ हैं, जिन पर मात्र मत रखा जा सकता है, सच तो तभी सामने आएगा जब आज-तक ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा’ कहकर दबाई गई फाइलें बाहर आएँगी और बाहर आएगी वर्षों से प्रतीक्षित एक हकीकत।


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Entertainment

The Family Man – अब रचनात्मक वेब सीरीज़ का समय है

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The Family Man Manoj Bajpayee

एक समय था दूरदर्शन का! सरकारी चैनल का दूरदर्शन नाम क्यों पड़ा इसके पीछे मेरी काल्पनिक कथा है। अस्सी का वह दशक जब मनोरंजन समाचारपत्र, पुस्तकों, नाटक, रेडियो और सिनेमाघरों से आगे चलकर टीवी तक पहुँच रहा था। कितना सत्य है पता नहीं पर मैंने कभी बचपन में सुना था कि टीवी खरीदने के लिए भी शुरुआती काल में अनुज्ञापत्र लेना होता था।

निःसन्देह किसी ने ऐसे ही मनगढ़ंत कह दिया होगा। उस काल में किसी के घर टीवी होना, आज मध्यम वर्गीय व्यक्ति के पास मर्सिडीज होने के बराबर था। रंगीन टीवी का युग तो बहुत देर से शुरू हुआ, प्रारम्भ में तो अधिकांशतः श्वेत-श्याम टीवी ही आते थे। गाँव में किसी इक्के-दुक्के के पास और शहरों में भी हर संकुल में किसी-किसी के पास ही टीवी होता था।

उस समय जब छायागीत, रामायण या महाभारत धारावाहिक हो या क्रिकेट मैच हो तो दूर दूर से पड़ोसी आते थे देखने के लिए, शायद इसलिए इसका नाम पड़ गया दूरदर्शन। हालाँकि यह मेरे मन की काल्पनिक कथा है और इसमें रत्ती भर सच नहीं है। शनैः शनैः टीवी के मनोरंजन में अद्भुत विकास हुआ। उम्मीद है “विकास” शब्द से किसी को आपत्ति ना हो! तो मात्र दो-तीन घंटों तक चलने वाला दूरदर्शन चौबीसों घंटे हो गया और चैनलों की तो बाढ़ आ गई। सन 2001 में आए धारावाहिक जिसे, “कौन बनेगा करोड़पति”, “क्योंकि साँस भी कभी बहू थी” आदि। उसके बाद शुरू हुआ धारावाहिकों के कभी ना समाप्त होने वाला और एक जैसी उबाऊ कहानी, पटकथा, निर्देशन, अभिनय का युग। कहीं कोई रचनात्मकता नहीं। परंतु साथ ही कुछ अच्छी फिल्मों के आने से और कहानियों और अभिनय में वास्तविक जीवन का रंग लगने से प्रतिभा को स्थान मिला। संवाद अधिक वास्तविक हो गए और आज सभी उम्र और वर्ग के दर्शकों के लिए सभी प्रकार की फिल्में और धारावाहिक हैं।

मनोरंजन जगत में क्रांति तो आयी ओटीटी प्लेटफॉर्म के कारण। इनकी कहानी, निर्देशन, अभिनय, संवाद की बात ही कुछ और है। पहले निर्माता मदारी था और दर्शक बंदर। टीवी पर वही देखना पड़ता जो वे दिखाते परंतु ओटीटी प्लेटफॉर्म जैसे नेटफ्लिक्स, अमेज़ोन जैसे दिग्गजों के कारण वस्तुस्थिति बदली है। अब दर्शक बंदर नहीं है, अब वह स्वतंत्र है उसकी पसंद की फिल्म या वेब सीरीज़ देखने के लिए। हालाँकि, बहुत-सी वेब सीरीज़ में कुछ अधिक ही नंगापन, गाली-गलौज, हिंसा दिखाई जाती है परंतु आजकल बहुत-सी बातें आम जीवन में होती है, शायद इसलिए लोगों में वेब सीरीज़ बहुत पसंद की जाती है।

कल ही अमेज़ोन पर आयी एक वेब सीरीज़ है “द फॅमिली मैन” जिसमें मनोज वाजपेयी मुख्य भूमिका में है। वेब सीरीज़ की पटकथा भारत के जासूसी तंत्र, आतंकवाद और अकारण फैलाई जा रही राजनैतिक हिंसा के इर्द-गिर्द घूमती है। इसकी सबसे अच्छी बात यह है कि दर्शकों को आकर्षित करने के लिए अकारण नंगापन नहीं दर्शाया गया है। हालाँकि प्रतिदिन के जीवन में हमारे हाव-भाव, मानसिकता और भाषा का खुलकर उपयोग किया गया है। मनोज वाजपेयी के अभिनय के लिए मुझे कुछ लिखने के अवश्यकता ही नहीं है। मनोज तो किरदार को घोलकर पी जाते हैं। अन्य कलाकारों ने भी बहुत अच्छा योगदान दिया है। “द फॅमिली मैन” एक ऐसे गुप्त जासूस की कहानी है जो हॉलीवुड का सुपरमैन नहीं है कि जिसके साथ सब अच्छा ही हो। वास्तविक जीवन की तरह इससे भी कुछ भूल हो सकती है। इसके जीवन में भी बहुत सी निजी समस्याएँ हो सकती हैं। दस भागों की यह वेब सीरीज़ अंतिम भाग तक दर्शकों को बांधे रखती है। वेब सीरीज़ को आप हिन्दी फोर्स्ड़ नैरेटीव (एफ एन) या क्लोज्ड कैप्शन के साथ देख सकते हैं बेहतर अनुभव के लिए।

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